महंगाई का दुश्चक्र

समूचे देश में महामारी के असर में बाजार की जो हालत है, उसमें स्थितियों के सहज रहने की उम्मीद नहीं की जा रही है। इसके बावजूद आम लोगों की अपेक्षा सरकार से जरूर बनी रही है कि वह उनकी मुश्किलों को कम करने की कोशिश करेगी। मगर ऐसा लगता है कि महामारी के चलते उपजे मौजूदा संकट ने सबके हाथ बांध रखे हैं।

गुरुवार को मुद्रास्फीति के जो ताजा आंकड़े जारी किए गए हैं, उससे साफ है कि फिलहाल बाजार में जरूरत के सामानों की कीमतों में स्थिरता नहीं आ पा रही है। बढ़ती महंगाई ने बाकी क्षेत्रों को इस कदर प्रभावित किया है कि अब खुदरा मुद्रास्फीति की दर जुलाई में बढ़ कर 6.93 फीसदी तक पहुंच गई। जब जून में मुद्रास्फीति के 6.23 फीसदी पर पहुंचने का आंकड़ा आया था, तब भी इस पर चिंता जताई गई थी।

मगर अब ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति में कोई बड़ा फर्क फिलहाल नहीं आ सका है, बल्कि चिंता और बढ़ी ही है। यह लगातार दूसरा महीना है जब खुदरा मुद्रास्फीति की दर रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर से ऊपर रही है।

गौरतलब है कि जून में जुलाई के मुकाबले पूर्णबंदी में कम ढील दी गई थी और तब बाजारों का खुलना शुरू ही हुआ था। यानी देश के कई हिस्सों में जुलाई महीने में बाजार का जितना हिस्सा खुल कर सहज होने की प्रक्रिया में आ गया, जून में उससे काफी कम क्षेत्र खुले थे।

वाहनों की आवाजाही के साधनों के सीमित होने और महामारी के संक्रमण की आशंका के चलते आम लोग भी तब घरों से कम निकल रहे थे। यानी कहा जा सकता है कि जुलाई की अपेक्षा जून में बाजार कम सहज हुआ था और तब आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति कम थी। लेकिन जुलाई में धीरे-धीरे कई क्षेत्रों में ढील दी गई और आपूर्ति में भी बढ़ोतरी हुई।

इसके बावजूद जरूरत के सामानों सहित खाद्य पदार्थों की कीमतों में न केवल कमी नहीं आई, बल्कि महंगाई की दर में बढ़ोतरी ही हुई और जुलाई में वह 9.62 फीसदी पर पहुंच गई। महंगाई दर का यह आंकड़ा जून में 8.72 फीसदी था। जाहिर है, इसमें पेट्रोल और खासतौर पर डीजल की कीमतों की भी भूमिका है। मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने का सीधा असर मुद्रास्फीति पर पड़ा और इसकी दर में भी बढ़ोतरी हो गई।

सरकार ने रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति दो फीसदी की कमी या बढ़ोतरी के साथ चार फीसदी के स्तर पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है। लेकिन ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि बाजार में खुदरा कीमतों पर लगाम लगाना संभव नहीं हो सका है। सही है कि घोषित तौर पर चरणबद्ध तरीके से पूर्णबंदी में काफी ढील दी गई है। लेकिन देश के कई हिस्से में आज भी पूर्णबंदी की ही स्थिति चल रही है। जहां बाजार खुले भी हैं, तो वहां थोक सामानों की आपूर्ति और खरीदारी में पहले जैसी सहजता नहीं आ सकी है।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बड़े पैमाने पर रोजगार जाने या व्यवसाय ठप्प पड़ने की वजह से लोगों की आय या तो बंद हो गई या फिर क्रय-शक्ति में भारी कमी आई है। ऐसे में लोग खाने-पीने के अनिवार्य सामानों के अलावा बहुत जरूरी होने पर ही कोई अन्य खरीदारी कर रहे हैं। शुरू में खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में कोई बड़ी बाधा नहीं होने की बात कही गई थी। लेकिन सच यह है कि पूर्णबंदी लागू होने के बाद से अब तक इस क्षेत्र में भी पूरी सहजता नहीं आ पाई है और खाने-पीने के सामानों की महंगाई भी लोगों को परेशान कर रही है।

Source: JanSatta