चिकित्सा का नोबेल

हैपेटाइटिस-ए और हैपेटाइटिस-बी के विषाणुओं का पता साठ के दशक में लग चुका था। तभी यह भी पता चला कि हैपेटाइटिस-ए का बुनियादी कारण गंदा खान-पान और हैपेटाइटिस-बी का कारण खून में होने वाला संक्रमण होता है। उस समय किसी ने हैपेटाइटिस-सी के बारे में कल्पना भी नहीं की थी।

चिकित्सा का नोबेल - A JanSatta Editorial
चिकित्सा का नोबेल – A JanSatta Editorial

दुनिया को लाइलाज बीमारियों से बचाने के लिए वैज्ञानिक अगर इलाज खोज लेते हैं और इससे लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा लेने का रास्ता निकल आता है तो इससे बड़ी मानवता की सेवा और कुछ नहीं हो सकती। इस साल का चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान उन तीन वैज्ञानिकों को मिला है जिन्होंने हैपेटाइटिस-सी के विषाणु की खोज की और इससे इस बीमारी का इलाज संभव हो पाया। भले अभी तक इसका टीका नहीं बना है, लेकिन कारगर दवाएं उपलब्ध हैं। इन वैज्ञानिकों को उनके काम के लिए यह सम्मान लगभग चार दशक बाद मिला है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इस खोज से करोड़ों लोगों को नई जिंदगी मिली।

सिर्फ हैपेटाइटिस ही नहीं, तमाम ऐसी जानलेवा बीमारियों की उत्पत्ति का कारण और उनके इलाज की खोजों ने चिकित्सा विज्ञान की लंबी यात्रा में मील के पत्थर के गाड़े हैं। इस लिहाज से चिकित्सा विज्ञान में महान योगदान देकर मानवता की सेवा करने वाले अमेरिका के दो वैज्ञानिकों हार्वे जे आल्टर और माइकल हफटन और ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स राइस को यह सम्मान मिलना हर इंसान को गर्व से भर देता है। वैज्ञानिक चाहे किसी देश के हों, उनकी उपलब्धियां और खोज पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए होती हैं, और खासतौर से चिकित्सा विज्ञान में इसलिए कि हर ऐसी खोज धरती पर इंसान का जीवन बचाने के लिए होती है।

हैपेटाइटिस-ए और हैपेटाइटिस-बी के विषाणुओं का पता साठ के दशक में लग चुका था। तभी यह भी पता चला कि हैपेटाइटिस-ए का बुनियादी कारण गंदा खान-पान और हैपेटाइटिस-बी का कारण खून में होने वाला संक्रमण होता है। उस समय किसी ने हैपेटाइटिस-सी के बारे में कल्पना भी नहीं की थी।

हैपेटाइटिस-बी के विषाणु की खोज के लिए 1976 में चिकित्सा विज्ञानी ब्रॉश ब्लमबर्ग को भी नोबेल सम्मान मिला था। लेकिन हैपेटाइटिस-सी के विषाणु की खोज की दिशा में काम तब बढ़ा, जब हर साल लाखों लोगों की मौत चिकित्सा विज्ञानियों के लिए चुनौती बनती जा रही थी। तब इन वैज्ञानिकों ने गंभीर रूप से पीड़ित हैपेटाइटिस बी मरीजों पर अध्ययन और प्रयोग शुरू किए।

तीनों वैज्ञानिकों का काम अलग-अलग रहा और इसी से बीमारी की तह तक पहुंचने और कड़ियों को जोड़ने में कामयाबी मिली। हार्वे जे आल्टर ने यह पता लगाया कि हैपेटाइटिस के पुराने मामलों का कारण कोई विषाणु ही है, जबकि माइकल हफटन ने 1982 में इस नए विषाणु के जीन को अलग कर उसका विश्लेषण किया और इसे हैपेटाइटिस-सी नाम दिया। तीसरे वैज्ञानिक चार्ल्स राइस ने अपने प्रयोगों से यह साबित कर दिखाया कि अकेला हैपेटाइटिस-सी का विषाणु भी इस बीमारी का कारण बन सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में सात करोड़ से ज्यादा लोग हैपेटाइटिस-सी से संक्रमित हैं और इनमें एक करोड़ से ज्यादा लोग भारत के हैं। भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक हैपेटाइटिस-सी के खात्मे का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान शुरू किया गया। लेकिन समस्या यह है कि हैपेटाइटिस सी के मरीजों में कई बार लक्षण काफी देर से उभरते हैं और तब तक मरीज लिवर कैंसर जैसी स्थिति का शिकार हो चुका होता है।

हैपेटाइटिस-सी का टीका अभी तक इसलिए नहीं बन पाया है क्योंकि इसका विषाणु जल्दी से अपना रूप बदल लेता है, जैसा कि कोरोना विषाणु के मामले में भी देखने को मिला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बीमारियों पर इंसान ने पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन काफी हद तक को काबू जरूर पा लिया है और बिना चिकित्सा विज्ञानियों के अथक परिश्रम और धैर्य के यह संभव नहीं हो पाता।